Saturday, August 5, 2023

ये हैं सरयूपारीण ब्राहमणों के मुख्य गाँव

 गर्ग (शुक्ल- वंश)

गर्ग ऋषि के तेरह लडके बताये जाते है जिन्हें गर्ग गोत्रीय, पंच प्रवरीय, शुक्ल बंशज  कहा जाता है जो तेरह गांवों में बिभक्त हों गये थे| गांवों के नाम कुछ इस प्रकार है|


(१) मामखोर (२) खखाइज खोर  (३) भेंडी  (४) बकरूआं  (५) अकोलियाँ  (६) भरवलियाँ  (७) कनइल (८) मोढीफेकरा (९) मल्हीयन (१०) महसों (११) महुलियार (१२) बुद्धहट (१३) इसमे चार  गाँव का नाम आता है लखनौरा, मुंजीयड, भांदी, और नौवागाँव| ये सारे गाँव लगभग गोरखपुर, देवरियां और बस्ती में आज भी पाए जाते हैं|


उपगर्ग (शुक्ल-वंश) 

उपगर्ग के छ: गाँव जो गर्ग ऋषि के अनुकरणीय थे कुछ इस प्रकार से हैं|


बरवां (२) चांदां (३) पिछौरां (४) कड़जहीं (५) सेदापार (६) दिक्षापार


यही मूलत: गाँव है जहाँ से शुक्ल बंश का उदय माना जाता है यहीं से लोग अन्यत्र भी जाकर शुक्ल     बंश का उत्थान कर रहें हैं यें सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं|


गौतम (मिश्र-वंश)


गौतम ऋषि के छ: पुत्र बताये जातें हैं जो इन छ: गांवों के वाशी थे|


(१) चंचाई (२) मधुबनी (३) चंपा (४) चंपारण (५) विडरा (६) भटीयारी


इन्ही छ: गांवों से गौतम गोत्रीय, त्रिप्रवरीय मिश्र वंश का उदय हुआ है, यहीं से अन्यत्र भी पलायन हुआ है ये सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं|


उप गौतम (मिश्र-वंश)


उप गौतम यानि गौतम के अनुकारक छ: गाँव इस प्रकार से हैं|


(१)  कालीडीहा (२) बहुडीह (३) वालेडीहा (४) भभयां (५) पतनाड़े  (६) कपीसा


इन गांवों से उप गौतम की उत्पत्ति  मानी जाति है|


वत्स गोत्र  ( मिश्र- वंश)


वत्स ऋषि के नौ पुत्र माने जाते हैं जो इन नौ गांवों में निवास करते थे|


(१) गाना (२) पयासी (३) हरियैया (४) नगहरा (५) अघइला (६) सेखुई (७) पीडहरा (८) राढ़ी (९) मकहडा


बताया जाता है की इनके वहा पांति का प्रचलन था अतएव इनको तीन के समकक्ष माना जाता है|


कौशिक गोत्र  (मिश्र-वंश)


तीन गांवों से इनकी उत्पत्ति बताई जाती है जो निम्न है|


(१) धर्मपुरा (२) सोगावरी (३) देशी


बशिष्ट गोत्र (मिश्र-वंश)


इनका निवास भी इन तीन गांवों में बताई जाती है|


(१) बट्टूपुर  मार्जनी (२) बढ़निया (३) खउसी


शांडिल्य गोत्र ( तिवारी,त्रिपाठी वंश) 


शांडिल्य ऋषि के बारह पुत्र बताये जाते हैं जो इन बाह गांवों से प्रभुत्व रखते हैं|


(१) सांडी (२) सोहगौरा (३) संरयाँ  (४) श्रीजन (५) धतूरा (६) भगराइच (७) बलूआ (८) हरदी (९) झूडीयाँ (१०) उनवलियाँ (११) लोनापार (१२) कटियारी, लोनापार में लोनाखार, कानापार, छपरा भी समाहित है  


इन्ही बारह गांवों से आज चारों तरफ इनका विकास हुआ है, यें सरयूपारीण ब्राह्मण हैं| इनका गोत्र श्री मुख शांडिल्य त्रि प्रवर है, श्री मुख शांडिल्य में घरानों का प्रचलन है जिसमे  राम घराना, कृष्ण घराना, नाथ घराना, मणी घराना है, इन चारों का उदय, सोहगौरा गोरखपुर से है जहाँ आज भी इन चारों का अस्तित्व कायम है| 


उप शांडिल्य ( तिवारी- त्रिपाठी, वंश)


इनके छ: गाँव बताये जाते हैं जी निम्नवत हैं|


(१) शीशवाँ (२) चौरीहाँ (३) चनरवटा (४) जोजिया (५) ढकरा (६) क़जरवटा


भार्गव गोत्र (तिवारी  या त्रिपाठी वंश)


भार्गव ऋषि के चार पुत्र बताये जाते हैं जिसमें  चार गांवों का उल्लेख मिलता है जो इस प्रकार है|


(१) सिंघनजोड़ी (२) सोताचक  (३) चेतियाँ  (४) मदनपुर


 भारद्वाज गोत्र (दुबे वंश)


भारद्वाज ऋषि के चार पुत्र बताये जाते हैं जिनकी उत्पत्ति इन चार गांवों से बताई जाती है|


(१) बड़गईयाँ (२) सरार (३) परहूँआ (४) गरयापार


कन्चनियाँ और लाठीयारी इन दो गांवों में दुबे घराना बताया जाता है जो वास्तव में गौतम मिश्र हैं लेकिन  इनके पिता क्रमश: उठातमनी और शंखमनी गौतम मिश्र थे परन्तु वासी (बस्ती) के राजा  बोधमल ने एक पोखरा खुदवाया जिसमे लट्ठा न चल पाया, राजा के कहने पर दोनों भाई मिल कर लट्ठे को चलाया जिसमे एक ने लट्ठे सोने वाला भाग पकड़ा तो दुसरें ने लाठी वाला भाग पकड़ा जिसमे कन्चनियाँ व लाठियारी का नाम पड़ा, दुबे की गददी होने से ये लोग दुबे कहलाने लगें| 


सरार के दुबे के वहां पांति का प्रचलन रहा है अतएव इनको तीन के समकक्ष माना जाता है|


सावरण गोत्र ( पाण्डेय वंश)


सावरण ऋषि के तीन पुत्र बताये जाते हैं इनके वहां भी पांति का प्रचलन रहा है जिन्हें तीन के समकक्ष माना जाता है जिनके तीन गाँव निम्न हैं| 


(१) इन्द्रपुर (२) दिलीपपुर (३) रकहट (चमरूपट्टी) 


सांकेत गोत्र (मलांव के पाण्डेय वंश)


सांकेत ऋषि के तीन पुत्र इन तीन गांवों से सम्बन्धित बताये जाते हैं|


(१) मलांव (२) नचइयाँ (३) चकसनियाँ


कश्यप गोत्र (त्रिफला के पाण्डेय वंश)


इन तीन गांवों से बताये जाते हैं|


(१) त्रिफला (२) मढ़रियाँ  (३) ढडमढीयाँ 


ओझा वंश 


इन तीन गांवों से बताये जाते हैं|


(१) करइली (२) खैरी (३) निपनियां 


चौबे -चतुर्वेदी, वंश (कश्यप गोत्र)


इनके लिए तीन गांवों का उल्लेख मिलता है|


(१) वंदनडीह (२) बलूआ (३) बेलउजां 


एक गाँव कुसहाँ का उल्लेख बताते है जो शायद उपाध्याय वंश का मालूम पड़ता है|


🌇ब्राह्मणों की वंशावली🌇

भविष्य पुराण के अनुसार ब्राह्मणों का इतिहास है की प्राचीन काल में महर्षि कश्यप के पुत्र कण्वय की आर्यावनी नाम की देव कन्या पत्नी हुई। ब्रम्हा की आज्ञा से 

दोनों कुरुक्षेत्र वासनी

सरस्वती नदी के तट 

पर गये और कण् व चतुर्वेदमय 

सूक्तों में सरस्वती देवी की स्तुति करने लगे

एक वर्ष बीत जाने पर वह देवी प्रसन्न हो वहां आयीं और ब्राम्हणो की समृद्धि के लिये उन्हें 

वरदान दिया ।

वर के प्रभाव कण्वय के आर्य बुद्धिवाले दस पुत्र हुए जिनका 

क्रमानुसार नाम था -

उपाध्याय,

दीक्षित,

पाठक,

शुक्ला,

मिश्रा,

अग्निहोत्री,

दुबे,

तिवारी,

पाण्डेय,

और

चतुर्वेदी ।

इन लोगो का जैसा नाम था वैसा ही गुण। इन लोगो ने नत मस्तक हो सरस्वती देवी को प्रसन्न किया। बारह वर्ष की अवस्था वाले उन लोगो को भक्तवत्सला शारदा देवी ने 

अपनी कन्याए प्रदान की।

वे क्रमशः

उपाध्यायी,

दीक्षिता,

पाठकी,

शुक्लिका,

मिश्राणी,

अग्निहोत्रिधी,

द्विवेदिनी,

तिवेदिनी

पाण्ड्यायनी,

और

चतुर्वेदिनी कहलायीं।

फिर उन कन्याआं के भी अपने-अपने पति से सोलह-सोलह पुत्र हुए हैं

वे सब गोत्रकार हुए जिनका नाम -

कष्यप,

भरद्वाज,

विश्वामित्र,

गौतम,

जमदग्रि,

वसिष्ठ,

वत्स,

गौतम,

पराशर,

गर्ग,

अत्रि,

भृगडत्र,

अंगिरा,

श्रंगी,

कात्याय,

और

याज्ञवल्क्य।

इन नामो से सोलह-सोलह पुत्र जाने जाते हैं।

मुख्य 10 प्रकार ब्राम्हणों ये हैं-

(1) तैलंगा,

(2) महार्राष्ट्रा,

(3) गुर्जर,

(4) द्रविड,

(5) कर्णटिका,

यह पांच "द्रविण" कहे जाते हैं, ये विन्ध्यांचल के दक्षिण में पाये जाते हैं|

तथा

विंध्यांचल के उत्तर में पाये जाने वाले या वास करने वाले ब्राम्हण

(1) सारस्वत,

(2) कान्यकुब्ज,

(3) गौड़,

(4) मैथिल,

(5) उत्कलये,

उत्तर के पंच गौड़ कहे जाते हैं।

वैसे ब्राम्हण अनेक हैं जिनका वर्णन आगे लिखा है।

ऐसी संख्या मुख्य 115 की है।

शाखा भेद अनेक हैं । इनके अलावा संकर जाति ब्राम्हण अनेक है ।

यहां मिली जुली उत्तर व दक्षिण के ब्राम्हणों की नामावली 115 की दे रहा हूं।

जो एक से दो और 2 से 5 और 5 से 10 और 10 से 84 भेद हुए हैं,

फिर उत्तर व दक्षिण के ब्राम्हण की संख्या शाखा भेद से 230 के

लगभग है | 

तथा और भी शाखा भेद हुए हैं, जो लगभग 300 के करीब ब्राम्हण भेदों की संख्या का लेखा पाया गया है।

उत्तर व दक्षिणी ब्राम्हणां के भेद इस प्रकार है

81 ब्राम्हाणां की 31 शाखा कुल 115 ब्राम्हण संख्या, मुख्य है -

(1) गौड़ ब्राम्हण,

(2)गुजरगौड़ ब्राम्हण (मारवाड,मालवा)

(3) श्री गौड़ ब्राम्हण,

(4) गंगापुत्र गौडत्र ब्राम्हण,

(5) हरियाणा गौड़ ब्राम्हण,

(6) वशिष्ठ गौड़ ब्राम्हण,

(7) शोरथ गौड ब्राम्हण,

(8) दालभ्य गौड़ ब्राम्हण,

(9) सुखसेन गौड़ ब्राम्हण,

(10) भटनागर गौड़ ब्राम्हण,

(11) सूरजध्वज गौड ब्राम्हण(षोभर),

(12) मथुरा के चौबे ब्राम्हण,

(13) वाल्मीकि ब्राम्हण,

(14) रायकवाल ब्राम्हण,

(15) गोमित्र ब्राम्हण,

(16) दायमा ब्राम्हण,

(17) सारस्वत ब्राम्हण,

(18) मैथल ब्राम्हण,

(19) कान्यकुब्ज ब्राम्हण,

(20) उत्कल ब्राम्हण,

(21) सरवरिया ब्राम्हण,

(22) पराशर ब्राम्हण,

(23) सनोडिया या सनाड्य,

(24)मित्र गौड़ ब्राम्हण,

(25) कपिल ब्राम्हण,

(26) तलाजिये ब्राम्हण,

(27) खेटुवे ब्राम्हण,

(28) नारदी ब्राम्हण,

(29) चन्द्रसर ब्राम्हण,

(30)वलादरे ब्राम्हण,

(31) गयावाल ब्राम्हण,

(32) ओडये ब्राम्हण,

(33) आभीर ब्राम्हण,

(34) पल्लीवास ब्राम्हण,

(35) लेटवास ब्राम्हण,

(36) सोमपुरा ब्राम्हण,

(37) काबोद सिद्धि ब्राम्हण,

(38) नदोर्या ब्राम्हण,

(39) भारती ब्राम्हण,

(40) पुश्करर्णी ब्राम्हण,

(41) गरुड़ गलिया ब्राम्हण,

(42) भार्गव ब्राम्हण,

(43) नार्मदीय ब्राम्हण,

(44) नन्दवाण ब्राम्हण,

(45) मैत्रयणी ब्राम्हण,

(46) अभिल्ल ब्राम्हण,

(47) मध्यान्दिनीय ब्राम्हण,

(48) टोलक ब्राम्हण,

(49) श्रीमाली ब्राम्हण,

(50) पोरवाल बनिये ब्राम्हण,

(51) श्रीमाली वैष्य ब्राम्हण 

(52) तांगड़ ब्राम्हण,

(53) सिंध ब्राम्हण,

(54) त्रिवेदी म्होड ब्राम्हण,

(55) इग्यर्शण ब्राम्हण,

(56) धनोजा म्होड ब्राम्हण,

(57) गौभुज ब्राम्हण,

(58) अट्टालजर ब्राम्हण,

(59) मधुकर ब्राम्हण,

(60) मंडलपुरवासी ब्राम्हण,

(61) खड़ायते ब्राम्हण,

(62) बाजरखेड़ा वाल ब्राम्हण,

(63) भीतरखेड़ा वाल ब्राम्हण,

(64) लाढवनिये ब्राम्हण,

(65) झारोला ब्राम्हण,

(66) अंतरदेवी ब्राम्हण,

(67) गालव ब्राम्हण,

(68) गिरनारे ब्राम्हण

सभी ब्राह्मण बंधुओ को मेरा नमस्कार बहुत दुर्लभ जानकारी है जरूर पढ़े। और समाज में शेयर करे हम क्या है

इस तरह ब्राह्मणों की उत्पत्ति और इतिहास के साथ इनका विस्तार अलग अलग राज्यो में हुआ और ये उस राज्य के ब्राह्मण कहलाये।

ब्राह्मण बिना धरती की कल्पना ही नहीं की जा सकती इसलिए ब्राह्मण होने पर गर्व करो और अपने कर्म और धर्म का पालन कर सनातन संस्कृति की रक्षा करें।


*************************************

नोट:आप सभी बंधुओं से अनुरोध है कि सभी ब्राह्मणों को भेजें और यथासम्भव अपनी वंशावली का प्रसार करने में सहयोग करें। महादेव  🙏  🙏🌹🌹

Thursday, March 23, 2023

कौन सुनाएगा कथा, ज्ञान या अहंकार?

 कौन सुनाएगा कथा?

सिद्धार्थनगर के शोरतगढ़ तहसील में एक छोटे से गाँव संगवारे के काशीराम के मिठाई का व्यापार बहुत ही अच्छा चल रहा था। उनके यहाँ की प्रसिद्ध मिठाई लौंगलता के चर्चे पड़ोसी देश नेपाल तक थे। काशीराम बड़े ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे और समय समय पर अपने घर कथा, भागवत पूजन आदि करवाते रहते थे। एक बार की बात है काशीराम ने अपने घर श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन करवाया जिसके लिए उन्होंने कठेला बाज़ार से अपने पूज्य गुरुदेव श्री रामचन्द्र त्रिपाठी जी को बुलवाया। कथा आरम्भ हुआ, घर परिवार सहित ग्रामीण भी खुश थे, यदि कोई नाराज़ था तो वह थे उस गाँव के पंडित जी। जिन्हें इस बात का कष्ट था कि हर छोटे बड़े और पूजा के लिए काशीराम उन्हें बुलाते थे लेकिन श्रीमद्भागवत कथा के भव्य आयोजन के लिए उन्होंने अपने गुरु जी को बुलाया। यह उनके लिए प्रतिष्ठा का विषय था। उन्हें लगता था कि ऐसा करके काशीराम उनका अपमान कर रहे हैं।

गाँव के पंडित जी पूरे गाँव में यह कहते फिर रहे थे कि गुरु जी को कुछ नहीं आता, उनसे अच्छा तो पंडित जी के बेटे भागवत कथा सुना सकते थे। उनके बेटे अयोध्या से अपनी संस्कृत की पढ़ाई पूरी करके जल्द ही लौटे थे, इस बात का उन्हें गर्व था।

धीरे धीरे यह बात पूरे गाँव में फैल गई, लोग कानाफूसी करने लगे कि गुरु जी से ज्यादा जानकार तो गाँव के पंडित जी का लड़का था, कथा उसी से सुनना चाहिए। काशीराम ने बाहरी गुरु जी को बुला कर गाँव की परंपरा को तोड़ा है। जब यह बात गुरु जी रामचन्द्र त्रिपाठी को पता चली तो उन्होंने कथा ना सुनाने का निर्णय लिया। उन्होंने कहा व्यास गद्दी पर गाँव का ही योग्य पंडित होना चाहिए, बस शर्त यह है कि व्यास गद्दी पर बैठने योग्य होना चाहिए अन्यथा कथा सुनने का कोई अर्थ नहीं रह जाता। 

गुरु जी ने कहा कि जो भी श्रीमद्भागवत पुस्तक के इस एक श्लोक का सही सही उच्चारण करेगा वही व्यास गद्दी पर आगे की कथा का पाठ करेगा। शाम का समय था काशीराम के घर पर ग्रामीणों की भीड़ जुट गई सभी यह देखना चाहते थे कि कथा पाठ करने के लिए होने वाले शास्त्रार्थ में कौन जीतेगा।

गुरु जी ने पंडित जी के बेटे को श्लोक पढ़ने को कहा,

यः स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेकमध्यात्मदीपमतितितीर्षतां तमोऽन्धम्।

संसारिणां करुणयाऽऽह पुराणगुह्यं तं व्याससूनुमुपयामि गुरुं मुनीनाम् ॥


माइक पर बोलते हुए बेटे ने श्लोक पढ़ा,

यः स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेकमध्यात्मदीपमतितितीर्षतां तमोऽन्धम्।

संसारिणा करुणयाऽऽह पुराणगुह्यं तं व्याससूनुमुपयामि गुरु मुनीनाम् ॥


 गुरु जी मुस्कुराए, बोले बेटा आपने कोशिश अच्छी की लेकिन मुझे लगता है आपको एक बार फिर से ध्यान से पढ़ना चाहिए। बेटे ने कहा ध्यान से पढ़ रहा हूँ, और अब आगे की कथा मैं ही सुनाऊँगा। गुरु जी ने फिर से कहा एक बार पुनः पढ़े कहीँ कुछ गलत तो नहीं हो रहा। बेटे ने दुबारा बड़े ही जोश में फिर से पढ़ा।

यः स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेकमध्यात्मदीपमतितितीर्षतां तमोऽन्धम्।

संसारिणा करुणयाऽऽह पुराणगुह्यं तं व्याससूनुमुपयामि गुरु मुनीनाम् ॥


गुरु जी ने सोचा यदि मैं इन्हें बोलुँगा कि वे गलत उच्चारण कर रहे हैं तो शायद वह इस बात को मानने को तैयार ना हों, अतः गुरु जी ने गाँव के ही एक पढ़े लिखे व्यक्ति को पास बुलाया और कहा कि बेटा अभी जो आपने पढ़ा है एक बार इनके सामने पढ़कर सुना दीजिए। इस बार पंडित जी के बेटे ने क्रोध में आकर बड़ी तेज़ी से फिर वही गलत उच्चारण किया।

यः स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेकमध्यात्मदीपमतितितीर्षतां तमोऽन्धम्।

संसारिणा करुणयाऽऽह पुराणगुह्यं तं व्याससूनुमुपयामि गुरु मुनीनाम् ॥


गुरु जी कुछ बोलते कि उससे पहले गाँव के उस पढ़े लिखे व्यक्ति ने कहा गुरु जी कथा तो आप ही कहेँगे, अभी इनको और अधिक पढ़ने की आवश्यकता है। दरअलस पंडित जी के बेटे संसारिणां और गुरुं शब्द का गलत उच्चारण कर  संसारिणा और गुरु बोल रहे थे।

अब पंडित जी को भी अपनी गलती का आभास हो गया था। वे बिना कुछ बोले वहाँ से चले गए।

गुरु जी ने पंडित जी के बेटे को से सम्मान अपने साथ बैठा कर आगे की कथा को ध्यान से सुनने को कहा

निर्णय हो चुका था, आगे की कथा पूरे 8 दिनों तक सभी ने बड़े ही आनंद पूर्वक सुनी अंतिम दिवस में हवन के बाद सभी ने भंडारे का प्रसाद ग्रहण किया। सब सन्तुष्ट थे।


Saturday, August 14, 2021

रामायण की इस सीख को सदैव याद रखें

 “रामायण” क्या है?? 


अगर कभी पढ़ो और समझो तो आंसुओ पे काबू रखना.......


रामायण का एक छोटा सा वृतांत है, उसी से शायद कुछ समझा सकूँ... 😊


एक रात की बात हैं, माता कौशल्या जी को सोते में अपने महल की छत पर किसी के चलने की आहट सुनाई दी। 

नींद खुल गई, पूछा कौन हैं ?


मालूम पड़ा श्रुतकीर्ति जी (सबसे छोटी बहु, शत्रुघ्न जी की पत्नी)हैं ।

माता कौशल्या जी ने उन्हें नीचे बुलाया |


श्रुतकीर्ति जी आईं, चरणों में प्रणाम कर खड़ी रह गईं


माता कौशिल्या जी ने पूछा, श्रुति ! इतनी रात को अकेली छत पर क्या कर रही हो बेटी ? 

क्या नींद नहीं आ रही ?


शत्रुघ्न कहाँ है ?


श्रुतिकीर्ति की आँखें भर आईं, माँ की छाती से चिपटी, 

गोद में सिमट गईं, बोलीं, माँ उन्हें तो देखे हुए तेरह वर्ष हो गए ।


उफ ! 

कौशल्या जी का ह्रदय काँप कर झटपटा गया ।


तुरंत आवाज लगाई, सेवक दौड़े आए । 

आधी रात ही पालकी तैयार हुई, आज शत्रुघ्न जी की खोज होगी, 

माँ चली ।


आपको मालूम है शत्रुघ्न जी कहाँ मिले ?


अयोध्या जी के जिस दरवाजे के बाहर भरत जी नंदिग्राम में तपस्वी होकर रहते हैं, उसी दरवाजे के भीतर एक पत्थर की शिला हैं, उसी शिला पर, अपनी बाँह का तकिया बनाकर लेटे मिले !! 


माँ सिराहने बैठ गईं, 

बालों में हाथ फिराया तो शत्रुघ्न जी नेआँखें खोलीं, 


माँ !


उठे, चरणों में गिरे, माँ ! आपने क्यों कष्ट किया ? 

मुझे बुलवा लिया होता ।


माँ ने कहा, 

शत्रुघ्न ! यहाँ क्यों ?"


शत्रुघ्न जी की रुलाई फूट पड़ी, बोले- माँ ! भैया राम जी पिताजी की आज्ञा से वन चले गए, 

भैया लक्ष्मण जी उनके पीछे चले गए, भैया भरत जी भी नंदिग्राम में हैं, क्या ये महल, ये रथ, ये राजसी वस्त्र, विधाता ने मेरे ही लिए बनाए हैं ?


माता कौशल्या जी निरुत्तर रह गईं ।


देखो क्या है ये रामकथा...


यह भोग की नहीं....त्याग की कथा हैं..!!


यहाँ त्याग की ही प्रतियोगिता चल रही हैं और सभी प्रथम हैं, कोई पीछे नहीं रहा...  चारो भाइयों का प्रेम और त्याग एक दूसरे के प्रति अद्भुत-अभिनव और अलौकिक हैं ।


"रामायण" जीवन जीने की सबसे उत्तम शिक्षा देती हैं ।


भगवान राम को 14 वर्ष का वनवास हुआ तो उनकी पत्नी सीता माईया ने भी सहर्ष वनवास स्वीकार कर लिया..!!


परन्तु बचपन से ही बड़े भाई की सेवा मे रहने वाले लक्ष्मण जी कैसे राम जी से दूर हो जाते! 

माता सुमित्रा से तो उन्होंने आज्ञा ले ली थी, वन जाने की.. 


परन्तु जब पत्नी “उर्मिला” के कक्ष की ओर बढ़ रहे थे तो सोच रहे थे कि माँ ने तो आज्ञा दे दी, 

परन्तु उर्मिला को कैसे समझाऊंगा.??


क्या बोलूँगा उनसे.?


यहीं सोच विचार करके लक्ष्मण जी जैसे ही अपने कक्ष में पहुंचे तो देखा कि उर्मिला जी आरती का थाल लेके खड़ी थीं और बोलीं- 


"आप मेरी चिंता छोड़ प्रभु श्रीराम की सेवा में वन को जाओ...मैं आपको नहीं रोकूँगीं। मेरे कारण आपकी सेवा में कोई बाधा न आये, इसलिये साथ जाने की जिद्द भी नहीं करूंगी।"


लक्ष्मण जी को कहने में संकोच हो रहा था.!!


परन्तु उनके कुछ कहने से पहले ही उर्मिला जी ने उन्हें संकोच से बाहर निकाल दिया..!!


वास्तव में यहीं पत्नी का धर्म है..पति संकोच में पड़े, उससे पहले ही पत्नी उसके मन की बात जानकर उसे संकोच से बाहर कर दे.!!


लक्ष्मण जी चले गये परन्तु 14 वर्ष तक उर्मिला ने एक तपस्विनी की भांति कठोर तप किया.!!


वन में “प्रभु श्री राम माता सीता” की सेवा में लक्ष्मण जी कभी सोये नहीं , परन्तु उर्मिला ने भी अपने महलों के द्वार कभी बंद नहीं किये और सारी रात जाग जागकर उस दीपक की लौ को बुझने नहीं दिया.!!


मेघनाथ से युद्ध करते हुए जब लक्ष्मण जी को “शक्ति” लग जाती है और हनुमान जी उनके लिये संजीवनी का पर्वत लेके लौट रहे होते हैं, तो बीच में जब हनुमान जी अयोध्या के ऊपर से गुजर रहे थे तो भरत जी उन्हें राक्षस समझकर बाण मारते हैं और हनुमान जी गिर जाते हैं.!!


तब हनुमान जी सारा वृत्तांत सुनाते हैं कि, सीता जी को रावण हर ले गया, लक्ष्मण जी युद्ध में मूर्छित हो गए हैं।


यह सुनते ही कौशल्या जी कहती हैं कि राम को कहना कि “लक्ष्मण” के बिना अयोध्या में पैर भी मत रखना। राम वन में ही रहे.!!


माता “सुमित्रा” कहती हैं कि राम से कहना कि कोई बात नहीं..अभी शत्रुघ्न है.!!


मैं उसे भेज दूंगी..मेरे दोनों पुत्र “राम सेवा” के लिये ही तो जन्मे हैं.!!


माताओं का प्रेम देखकर हनुमान जी की आँखों से अश्रुधारा बह रही थी। परन्तु जब उन्होंने उर्मिला जी को देखा तो सोचने लगे कि, यह क्यों एकदम शांत और प्रसन्न खड़ी हैं?


क्या इन्हें अपनी पति के प्राणों की कोई चिंता नहीं?


हनुमान जी पूछते हैं- देवी! 


आपकी प्रसन्नता का कारण क्या है? आपके पति के प्राण संकट में हैं...सूर्य उदित होते ही सूर्य कुल का दीपक बुझ जायेगा। 


उर्मिला जी का उत्तर सुनकर तीनों लोकों का कोई भी प्राणी उनकी वंदना किये बिना नहीं रह पाएगा.!!


उर्मिला बोलीं- "

मेरा दीपक संकट में नहीं है, वो बुझ ही नहीं सकता.!!


रही सूर्योदय की बात तो आप चाहें तो कुछ दिन अयोध्या में विश्राम कर लीजिये, क्योंकि आपके वहां पहुंचे बिना सूर्य उदित हो ही नहीं सकता.!!


आपने कहा कि, प्रभु श्रीराम मेरे पति को अपनी गोद में लेकर बैठे हैं..!


जो “योगेश्वर प्रभु श्री राम” की गोदी में लेटा हो, काल उसे छू भी नहीं सकता..!!


यह तो वो दोनों लीला कर रहे हैं..


मेरे पति जब से वन गये हैं, तबसे सोये नहीं हैं..


उन्होंने न सोने का प्रण लिया था..इसलिए वे थोड़ी देर विश्राम कर रहे हैं..और जब भगवान् की गोद मिल गयी तो थोड़ा विश्राम ज्यादा हो गया...वे उठ जायेंगे..!!


और “शक्ति” मेरे पति को लगी ही नहीं, शक्ति तो प्रभु श्री राम जी को लगी है.!!


मेरे पति की हर श्वास में राम हैं, हर धड़कन में राम, उनके रोम रोम में राम हैं, उनके खून की बूंद बूंद में राम हैं, और जब उनके शरीर और आत्मा में ही सिर्फ राम हैं, तो शक्ति राम जी को ही लगी, दर्द राम जी को ही हो रहा.!!


इसलिये हनुमान जी आप निश्चिन्त होके जाएँ..सूर्य उदित नहीं होगा।"


राम राज्य की नींव जनक जी की बेटियां ही थीं... 


कभी “सीता” तो कभी “उर्मिला”..!!


 भगवान् राम ने तो केवल राम राज्य का कलश स्थापित किया ..परन्तु वास्तव में राम राज्य इन सबके प्रेम, त्याग, समर्पण और बलिदान से ही आया .!!


जिस मनुष्य में प्रेम, त्याग, समर्पण की भावना हो उस मनुष्य में राम हि बसता है... 

कभी समय मिले तो अपने वेद, पुराण, गीता, रामायण को पढ़ने और समझने का प्रयास कीजिएगा .,जीवन को एक अलग नज़रिए से देखने और जीने का सऊर मिलेगा .!!


"लक्ष्मण सा भाई हो, कौशल्या माई हो,

स्वामी तुम जैसा, मेरा रघुराइ हो.. 

नगरी हो अयोध्या सी, रघुकुल सा घराना हो, 

चरण हो राघव के, जहाँ मेरा ठिकाना हो..

हो त्याग भरत जैसा, सीता सी नारी हो, 

लव कुश के जैसी, संतान हमारी हो.. 

श्रद्धा हो श्रवण जैसी, सबरी सी भक्ति हो, 

हनुमत के जैसी निष्ठा और शक्ति हो... "

ये रामायण है, पुण्य कथा श्री राम की।


कृपया आगे सभी को भेजें।

 अधिक से अधिक शेयर  करें  

बच्चों  को जरूर पढायें  


!! जय जय श्री राम !!

Saturday, June 20, 2020

मणि वंशी त्रिपाठी के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति ने वंश के बारे में दी यह जानकारी

दरअसल सेवक सेहरी में रहने वाले त्रिपाठी परिवारों में मतभेद था कि वे किस वंश (राम, कृष्ण, नाथ और मणि) के हैं ? जिसकी सही और सटीक जानकारी प्राप्त करने के लिए हमारे सहयोगी सदस्य ने सेवक सेहरी की तरफ रुख किया, जहाँ उनकी मुलाकात सेवक सेहरी निवासी मणि वंशी त्रिपाठी के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति बाबा भवानी भीख त्रिपाठी जी से हुई! उन्होंने स्पष्ट किया कि सेवक सेहरी में रहने वाले सभी त्रिपाठी मणि वंश के हैं!


बाबा ने क्या कहा सुने ...


Monday, June 8, 2020

श्री नरेन्द्र मणि त्रिपाठी वंशावली

<= इनसे पूर्व


  • श्री नरेन्द्र मणि त्रिपाठी 
    • अभिषेक मणि त्रिपाठी 
    • उत्कर्ष मणि त्रिपाठी 

Thursday, May 28, 2020

क्या आपको पता है ब्राह्मण की ये 11 बातें

प्रत्येक सनातनधर्मलम्बी को अपनी कुल परम्परा का सम्पूर्ण परिचय निम्न ११ (एकादश) बिन्दुओं के माध्यम से ज्ञात होना चाहिए -

  1. गोत्र 
  2. प्रवर
  3. वेद 
  4. उपवेद
  5. शाखा
  6. सूत्र
  7. छन्द
  8. शिखा
  9. पाद
  10. देवता
  11. द्वार


गोत्र क्या है ?

गोत्र का अर्थ है कि वह कौन से ऋषिकुल का है या उसका जन्म किस ऋषिकुल से सम्बन्धित है। किसी व्यक्ति की वंश-परम्परा जहां से प्रारम्भ होती है, उस वंश का गोत्र भी वहीं से प्रचलित होता गया है। हम सभी जानते हें की हम किसी न किसी ऋषि की ही संतान है, इस प्रकार से जो जिस ऋषि से प्रारम्भ हुआ वह उस ऋषि का वंशज कहा गया ।
इन गोत्रों के मूल ऋषि –

  1. विश्वामित्र, 
  2. जमदग्नि, 
  3. भारद्वाज, 
  4. गौतम, 
  5. अत्रि, 
  6. वशिष्ठ, 
  7. कश्यप


इन सप्तऋषियों और आठवें ऋषि अगस्त्य की संतान गोत्र कहलाती है। यानी जिस व्यक्ति का गौत्र भारद्वाज है, उसके पूर्वज ऋषि भारद्वाज थे और वह व्यक्ति इस ऋषि का वंशज है। इस प्रकार कालांतर में ब्राह्मणो की संख्या बढ़ते जाने पर पक्ष ओर शाखाये बनाई गई । इस तरह इन सप्त ऋषियों पश्चात उनकी संतानों के विद्वान ऋषियों के नामो से अन्य गोत्रों का नामकरण हुआ।

क्या गोत्र हमेशा एक ही रहता है?

मनुस्मृति के अनुसार, सात पीढ़ी बाद सगापन खत्म हो जाता है अर्थात सात पीढ़ी बाद गोत्र का मान बदल जाता है. आठवी पीढ़ी के पुरुष के नाम से नया गोत्र शुरू होता है. लेकिन गोत्र की सही गणना का पता न होने के कारण हिंदू लोग लाखों हजारो वर्ष पहले पैदा हुए पूर्वजों के नाम से अपना गोत्र चला रहे हैं, जिससे वैवाहिक जटिलताएं भी पैदा हो रही हैं.

प्रवर किसे कहते हैं ? 


प्रवर का अर्थ हे 'श्रेष्ठ" । अपनी कुल परम्परा के पूर्वजों एवं महान ऋषियों को प्रवर कहते हें । अपने कर्मो द्वारा ऋषिकुल में प्राप्‍त की गई श्रेष्‍ठता के अनुसार उन गोत्र प्रवर्तक मूल ऋषि के बाद होने वाले व्यक्ति, जो महान हो गए वे उस गोत्र के प्रवर कहलाते हें। इसका अर्थ है कि आपके कुल में आपके गोत्रप्रवर्त्तक मूल ऋषि के अनन्तर तीन अथवा पाँच आदि अन्य ऋषि भी विशेष महान हुए थे ।

वेद परिचय 

वेदों का साक्षात्कार ऋषियों ने लाभ किया है , इनको सुनकर कंठस्थ किया जाता है , इन वेदों के उपदेशक गोत्रकार ऋषियों के जिस भाग का अध्ययन, अध्यापन, प्रचार प्रसार, आदि किया, उसकी रक्षा का भार उसकी संतान पर पड़ता गया इससे उनके पूर्व पुरूष जिस वेद ज्ञाता थे तदनुसार वेदाभ्‍यासी कहलाते हैं। प्रत्येक का अपना एक विशिष्ट वेद होता है , जिसे वह अध्ययन -अध्यापन करता है ।

उपवेद के बारे में  

प्रत्येक वेद से सम्बद्ध विशिष्ट उपवेद का भी ज्ञान होना चाहिये ।

शाखा क्या है ?

वेदो के विस्तार के साथ ऋषियों ने प्रत्येक एक गोत्र के लिए एक वेद के अध्ययन की परंपरा डाली है , कालान्तर में जब एक व्यक्ति उसके गोत्र के लिए निर्धारित वेद पढने में असमर्थ हो जाता था तो ऋषियों ने वैदिक परम्परा को जीवित रखने के लिए शाखाओं का निर्माण किया। इस प्रकार से प्रत्येक गोत्र के लिए अपने वेद की उस शाखा का पूर्ण अध्ययन करना आवश्यक कर दिया। इस प्रकार से उन्‍होने जिसका अध्‍ययन किया, वह उस वेद की शाखा के नाम से पहचाना गया।

फिर सूत्र क्यों?

प्रत्येक वेद के अपने 2 प्रकार के सूत्र हैं।

  1. श्रौत सूत्र और 
  2. ग्राह्य सूत्र

यथा शुक्ल यजुर्वेद का कात्यायन श्रौत सूत्र और पारस्कर ग्राह्य सूत्र है।

छन्द क्या है ? 

उक्तानुसार ही प्रत्येक ब्राह्मण को अपने परम्परासम्मत छन्द का भी ज्ञान होना चाहिए ।

शिखा के बारे में 

अपनी कुल परम्परा के अनुरूप शिखा को दक्षिणावर्त अथवा वामावार्त्त रूप से बांधने की परम्परा शिखा कहलाती है ।

पाद क्या है ? 

अपने-अपने गोत्रानुसार लोग अपना पाद प्रक्षालन (पैर धुलना) करते हैं । ये भी अपनी एक पहचान बनाने के लिए ही, बनाया गया एक नियम है । अपने -अपने गोत्र के अनुसार ब्राह्मण लोग पहले अपना बायाँ पैर धोते, तो किसी गोत्र के लोग पहले अपना दायाँ पैर धोते, इसे ही पाद कहते हैं ।

देवता को भी जाने 

प्रत्येक वेद या शाखा का पठन, पाठन करने वाले किसी विशेष देव की आराधना करते है वही उनका कुल देवता विष्णु, शिव , दुर्गा ,सूर्य इत्यादि देवों में से कोई एक ] उनके आराध्‍य देव है ।

द्वार के बारे में 

यज्ञ मण्डप में अध्वर्यु (यज्ञकर्त्ता ) जिस दिशा अथवा द्वार से प्रवेश करता है अथवा जिस दिशा में बैठता है, वही उस गोत्र वालों की द्वार या दिशा कही जाती है।

शांडिल्य गोत्र का पूर्ण परिचय

सरयूपारी क्या है ?

ऋग्वेद में तीन नदियों का वर्णन है सरस्वती, सिन्धु और सरयू।  सरयू नदी के पूर्वी तट पर बसे ब्राहमण सरयूपारी या सरवरिया ब्राह्मण कहलाए।

कहाँ से आया शांडिल्य  गोत्र ?

वैसे तो भारत में बड़े ही ऋषि मुनि हुए किन्तु 49 ऋषियों के नाम पर गोत्र बने। ऋषियों के शिष्य प्रवरकार कहे जाते थे तथा इन ऋषियों के आश्रम में दी जाने वाली वेद, उपवेद आदि की शिक्षा के अनुरूप उन्हें गोत्र में बाटा गया। आज सरयूपारी ब्राहमण में जो 3, 13, 16 घराने कहे जाते हैं उसके पीछे उन ऋषियों के ज्ञान को आगे की पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए उन्हें अलग अलग शाखावो में विभाजित करना है।
ऋषि गर्ग के आश्रम में यजुर्वेद का पठन पाठन आरम्भ हुआ तो पहला गोत्र गर्ग के नाम से आरम्भ हुआ। इसी प्रकार ऋषि गौतम और शांडिल्य के आश्रम में यजुर्वेद और सामवेद पढ़ाने की परम्परा शुरू हुई जो आगे चल कर गर्ग गौतम और शांडिल्य के नाम से गोत्र बने। इसी शांडिल्य गोत्र में हम सभी मणि वंशी त्रिपाठी का जन्म हुआ।

युधिष्ठिर की सभा में विद्यमान ऋषियों में शाण्डिल्य का नाम है। राजा सुमंतु ने इनको प्रचुर दान दिया था, यह अनुश पर्व (137। 22) से जाना जाता है। अनुशासन 65.19 से जाना जाता है कि इसी ऋषि ने बैलगाड़ी के दान को श्रेष्ठ दान कहा था।

महर्षि कश्यप के पुत्र महर्षि असित इनके पुत्र महर्षि देवल जिन्होंने ने अग्नि से एक पुत्र को उत्पन्न किया अग्नि से उत्पन्न होने के कारण इनको शांडिल्य कहा गया इनके दो पुत्र थे श्रीमुख एवं गर्दभ मुख आज भारत के सभी राज्यों में इनके वंशज मौजूद हैं।

शांडिल्य ऋषि के बारह पुत्र हुए जो इन बारह गांवों से प्रभुत्व रखते हैं।

  1. सांडी 
  2. सोहगौरा 
  3. संरयाँ 
  4. श्रीजन 
  5. धतूरा 
  6. भगराइच 
  7. बलूआ 
  8. हरदी 
  9. झूडीयाँ 
  10. उनवलियाँ 
  11. लोनापार 
  12. कटियारी 
(लोनापार में लोनाखार, कानापार, छपरा भी समाहित है।)


इन्ही बारह गांवों से आज चारों तरफ इनका विकास हुआ है, यें सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं। इनका गोत्र श्री मुख शांडिल्य त्रि प्रवर है, हमारा मूल स्थान श्रीजन है। श्री मुख शांडिल्य में घरानों का प्रचलन है जिसमे

  1. राम घराना 
  2. कृष्ण घराना
  3. नाथ घराना
  4. मणी घराना है


इन चारों का उदय, सोहगौरा गोरखपुर से है, जहाँ आज भी इन चारों का अस्तित्व कायम है, जिसमे मणि घराना बुढियाबारी से है।


उप शांडिल्य ( तिवारी- त्रिपाठी, वंश)


इनके छ: गाँव बताये जाते हैं जी निम्नवत हैं।

  1. शीशवाँ 
  2. चौरीहाँ 
  3. चनरवटा 
  4. जोजिया 
  5. ढकरा 
  6. क़जरवटा 


भार्गव गोत्र (तिवारी या त्रिपाठी वंश)


भार्गव ऋषि के चार पुत्र बताये जाते हैं जिसमें चार गांवों का उल्लेख मिलता है|

  1. सिंघनजोड़ी 
  2. सोताचक 
  3. चेतियाँ 
  4. मदनपुर

ये हैं सरयूपारीण ब्राहमणों के मुख्य गाँव

 गर्ग (शुक्ल- वंश) गर्ग ऋषि के तेरह लडके बताये जाते है जिन्हें गर्ग गोत्रीय, पंच प्रवरीय, शुक्ल बंशज  कहा जाता है जो तेरह गांवों में बिभक्त ...