Thursday, May 28, 2020

क्या आपको पता है ब्राह्मण की ये 11 बातें

प्रत्येक सनातनधर्मलम्बी को अपनी कुल परम्परा का सम्पूर्ण परिचय निम्न ११ (एकादश) बिन्दुओं के माध्यम से ज्ञात होना चाहिए -

  1. गोत्र 
  2. प्रवर
  3. वेद 
  4. उपवेद
  5. शाखा
  6. सूत्र
  7. छन्द
  8. शिखा
  9. पाद
  10. देवता
  11. द्वार


गोत्र क्या है ?

गोत्र का अर्थ है कि वह कौन से ऋषिकुल का है या उसका जन्म किस ऋषिकुल से सम्बन्धित है। किसी व्यक्ति की वंश-परम्परा जहां से प्रारम्भ होती है, उस वंश का गोत्र भी वहीं से प्रचलित होता गया है। हम सभी जानते हें की हम किसी न किसी ऋषि की ही संतान है, इस प्रकार से जो जिस ऋषि से प्रारम्भ हुआ वह उस ऋषि का वंशज कहा गया ।
इन गोत्रों के मूल ऋषि –

  1. विश्वामित्र, 
  2. जमदग्नि, 
  3. भारद्वाज, 
  4. गौतम, 
  5. अत्रि, 
  6. वशिष्ठ, 
  7. कश्यप


इन सप्तऋषियों और आठवें ऋषि अगस्त्य की संतान गोत्र कहलाती है। यानी जिस व्यक्ति का गौत्र भारद्वाज है, उसके पूर्वज ऋषि भारद्वाज थे और वह व्यक्ति इस ऋषि का वंशज है। इस प्रकार कालांतर में ब्राह्मणो की संख्या बढ़ते जाने पर पक्ष ओर शाखाये बनाई गई । इस तरह इन सप्त ऋषियों पश्चात उनकी संतानों के विद्वान ऋषियों के नामो से अन्य गोत्रों का नामकरण हुआ।

क्या गोत्र हमेशा एक ही रहता है?

मनुस्मृति के अनुसार, सात पीढ़ी बाद सगापन खत्म हो जाता है अर्थात सात पीढ़ी बाद गोत्र का मान बदल जाता है. आठवी पीढ़ी के पुरुष के नाम से नया गोत्र शुरू होता है. लेकिन गोत्र की सही गणना का पता न होने के कारण हिंदू लोग लाखों हजारो वर्ष पहले पैदा हुए पूर्वजों के नाम से अपना गोत्र चला रहे हैं, जिससे वैवाहिक जटिलताएं भी पैदा हो रही हैं.

प्रवर किसे कहते हैं ? 


प्रवर का अर्थ हे 'श्रेष्ठ" । अपनी कुल परम्परा के पूर्वजों एवं महान ऋषियों को प्रवर कहते हें । अपने कर्मो द्वारा ऋषिकुल में प्राप्‍त की गई श्रेष्‍ठता के अनुसार उन गोत्र प्रवर्तक मूल ऋषि के बाद होने वाले व्यक्ति, जो महान हो गए वे उस गोत्र के प्रवर कहलाते हें। इसका अर्थ है कि आपके कुल में आपके गोत्रप्रवर्त्तक मूल ऋषि के अनन्तर तीन अथवा पाँच आदि अन्य ऋषि भी विशेष महान हुए थे ।

वेद परिचय 

वेदों का साक्षात्कार ऋषियों ने लाभ किया है , इनको सुनकर कंठस्थ किया जाता है , इन वेदों के उपदेशक गोत्रकार ऋषियों के जिस भाग का अध्ययन, अध्यापन, प्रचार प्रसार, आदि किया, उसकी रक्षा का भार उसकी संतान पर पड़ता गया इससे उनके पूर्व पुरूष जिस वेद ज्ञाता थे तदनुसार वेदाभ्‍यासी कहलाते हैं। प्रत्येक का अपना एक विशिष्ट वेद होता है , जिसे वह अध्ययन -अध्यापन करता है ।

उपवेद के बारे में  

प्रत्येक वेद से सम्बद्ध विशिष्ट उपवेद का भी ज्ञान होना चाहिये ।

शाखा क्या है ?

वेदो के विस्तार के साथ ऋषियों ने प्रत्येक एक गोत्र के लिए एक वेद के अध्ययन की परंपरा डाली है , कालान्तर में जब एक व्यक्ति उसके गोत्र के लिए निर्धारित वेद पढने में असमर्थ हो जाता था तो ऋषियों ने वैदिक परम्परा को जीवित रखने के लिए शाखाओं का निर्माण किया। इस प्रकार से प्रत्येक गोत्र के लिए अपने वेद की उस शाखा का पूर्ण अध्ययन करना आवश्यक कर दिया। इस प्रकार से उन्‍होने जिसका अध्‍ययन किया, वह उस वेद की शाखा के नाम से पहचाना गया।

फिर सूत्र क्यों?

प्रत्येक वेद के अपने 2 प्रकार के सूत्र हैं।

  1. श्रौत सूत्र और 
  2. ग्राह्य सूत्र

यथा शुक्ल यजुर्वेद का कात्यायन श्रौत सूत्र और पारस्कर ग्राह्य सूत्र है।

छन्द क्या है ? 

उक्तानुसार ही प्रत्येक ब्राह्मण को अपने परम्परासम्मत छन्द का भी ज्ञान होना चाहिए ।

शिखा के बारे में 

अपनी कुल परम्परा के अनुरूप शिखा को दक्षिणावर्त अथवा वामावार्त्त रूप से बांधने की परम्परा शिखा कहलाती है ।

पाद क्या है ? 

अपने-अपने गोत्रानुसार लोग अपना पाद प्रक्षालन (पैर धुलना) करते हैं । ये भी अपनी एक पहचान बनाने के लिए ही, बनाया गया एक नियम है । अपने -अपने गोत्र के अनुसार ब्राह्मण लोग पहले अपना बायाँ पैर धोते, तो किसी गोत्र के लोग पहले अपना दायाँ पैर धोते, इसे ही पाद कहते हैं ।

देवता को भी जाने 

प्रत्येक वेद या शाखा का पठन, पाठन करने वाले किसी विशेष देव की आराधना करते है वही उनका कुल देवता विष्णु, शिव , दुर्गा ,सूर्य इत्यादि देवों में से कोई एक ] उनके आराध्‍य देव है ।

द्वार के बारे में 

यज्ञ मण्डप में अध्वर्यु (यज्ञकर्त्ता ) जिस दिशा अथवा द्वार से प्रवेश करता है अथवा जिस दिशा में बैठता है, वही उस गोत्र वालों की द्वार या दिशा कही जाती है।

शांडिल्य गोत्र का पूर्ण परिचय

सरयूपारी क्या है ?

ऋग्वेद में तीन नदियों का वर्णन है सरस्वती, सिन्धु और सरयू।  सरयू नदी के पूर्वी तट पर बसे ब्राहमण सरयूपारी या सरवरिया ब्राह्मण कहलाए।

कहाँ से आया शांडिल्य  गोत्र ?

वैसे तो भारत में बड़े ही ऋषि मुनि हुए किन्तु 49 ऋषियों के नाम पर गोत्र बने। ऋषियों के शिष्य प्रवरकार कहे जाते थे तथा इन ऋषियों के आश्रम में दी जाने वाली वेद, उपवेद आदि की शिक्षा के अनुरूप उन्हें गोत्र में बाटा गया। आज सरयूपारी ब्राहमण में जो 3, 13, 16 घराने कहे जाते हैं उसके पीछे उन ऋषियों के ज्ञान को आगे की पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए उन्हें अलग अलग शाखावो में विभाजित करना है।
ऋषि गर्ग के आश्रम में यजुर्वेद का पठन पाठन आरम्भ हुआ तो पहला गोत्र गर्ग के नाम से आरम्भ हुआ। इसी प्रकार ऋषि गौतम और शांडिल्य के आश्रम में यजुर्वेद और सामवेद पढ़ाने की परम्परा शुरू हुई जो आगे चल कर गर्ग गौतम और शांडिल्य के नाम से गोत्र बने। इसी शांडिल्य गोत्र में हम सभी मणि वंशी त्रिपाठी का जन्म हुआ।

युधिष्ठिर की सभा में विद्यमान ऋषियों में शाण्डिल्य का नाम है। राजा सुमंतु ने इनको प्रचुर दान दिया था, यह अनुश पर्व (137। 22) से जाना जाता है। अनुशासन 65.19 से जाना जाता है कि इसी ऋषि ने बैलगाड़ी के दान को श्रेष्ठ दान कहा था।

महर्षि कश्यप के पुत्र महर्षि असित इनके पुत्र महर्षि देवल जिन्होंने ने अग्नि से एक पुत्र को उत्पन्न किया अग्नि से उत्पन्न होने के कारण इनको शांडिल्य कहा गया इनके दो पुत्र थे श्रीमुख एवं गर्दभ मुख आज भारत के सभी राज्यों में इनके वंशज मौजूद हैं।

शांडिल्य ऋषि के बारह पुत्र हुए जो इन बारह गांवों से प्रभुत्व रखते हैं।

  1. सांडी 
  2. सोहगौरा 
  3. संरयाँ 
  4. श्रीजन 
  5. धतूरा 
  6. भगराइच 
  7. बलूआ 
  8. हरदी 
  9. झूडीयाँ 
  10. उनवलियाँ 
  11. लोनापार 
  12. कटियारी 
(लोनापार में लोनाखार, कानापार, छपरा भी समाहित है।)


इन्ही बारह गांवों से आज चारों तरफ इनका विकास हुआ है, यें सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं। इनका गोत्र श्री मुख शांडिल्य त्रि प्रवर है, हमारा मूल स्थान श्रीजन है। श्री मुख शांडिल्य में घरानों का प्रचलन है जिसमे

  1. राम घराना 
  2. कृष्ण घराना
  3. नाथ घराना
  4. मणी घराना है


इन चारों का उदय, सोहगौरा गोरखपुर से है, जहाँ आज भी इन चारों का अस्तित्व कायम है, जिसमे मणि घराना बुढियाबारी से है।


उप शांडिल्य ( तिवारी- त्रिपाठी, वंश)


इनके छ: गाँव बताये जाते हैं जी निम्नवत हैं।

  1. शीशवाँ 
  2. चौरीहाँ 
  3. चनरवटा 
  4. जोजिया 
  5. ढकरा 
  6. क़जरवटा 


भार्गव गोत्र (तिवारी या त्रिपाठी वंश)


भार्गव ऋषि के चार पुत्र बताये जाते हैं जिसमें चार गांवों का उल्लेख मिलता है|

  1. सिंघनजोड़ी 
  2. सोताचक 
  3. चेतियाँ 
  4. मदनपुर

ये हैं सरयूपारीण ब्राहमणों के मुख्य गाँव

 गर्ग (शुक्ल- वंश) गर्ग ऋषि के तेरह लडके बताये जाते है जिन्हें गर्ग गोत्रीय, पंच प्रवरीय, शुक्ल बंशज  कहा जाता है जो तेरह गांवों में बिभक्त ...