कौन सुनाएगा कथा?
सिद्धार्थनगर के शोरतगढ़ तहसील में एक छोटे से गाँव संगवारे के काशीराम के मिठाई का व्यापार बहुत ही अच्छा चल रहा था। उनके यहाँ की प्रसिद्ध मिठाई लौंगलता के चर्चे पड़ोसी देश नेपाल तक थे। काशीराम बड़े ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे और समय समय पर अपने घर कथा, भागवत पूजन आदि करवाते रहते थे। एक बार की बात है काशीराम ने अपने घर श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन करवाया जिसके लिए उन्होंने कठेला बाज़ार से अपने पूज्य गुरुदेव श्री रामचन्द्र त्रिपाठी जी को बुलवाया। कथा आरम्भ हुआ, घर परिवार सहित ग्रामीण भी खुश थे, यदि कोई नाराज़ था तो वह थे उस गाँव के पंडित जी। जिन्हें इस बात का कष्ट था कि हर छोटे बड़े और पूजा के लिए काशीराम उन्हें बुलाते थे लेकिन श्रीमद्भागवत कथा के भव्य आयोजन के लिए उन्होंने अपने गुरु जी को बुलाया। यह उनके लिए प्रतिष्ठा का विषय था। उन्हें लगता था कि ऐसा करके काशीराम उनका अपमान कर रहे हैं।
गाँव के पंडित जी पूरे गाँव में यह कहते फिर रहे थे कि गुरु जी को कुछ नहीं आता, उनसे अच्छा तो पंडित जी के बेटे भागवत कथा सुना सकते थे। उनके बेटे अयोध्या से अपनी संस्कृत की पढ़ाई पूरी करके जल्द ही लौटे थे, इस बात का उन्हें गर्व था।
धीरे धीरे यह बात पूरे गाँव में फैल गई, लोग कानाफूसी करने लगे कि गुरु जी से ज्यादा जानकार तो गाँव के पंडित जी का लड़का था, कथा उसी से सुनना चाहिए। काशीराम ने बाहरी गुरु जी को बुला कर गाँव की परंपरा को तोड़ा है। जब यह बात गुरु जी रामचन्द्र त्रिपाठी को पता चली तो उन्होंने कथा ना सुनाने का निर्णय लिया। उन्होंने कहा व्यास गद्दी पर गाँव का ही योग्य पंडित होना चाहिए, बस शर्त यह है कि व्यास गद्दी पर बैठने योग्य होना चाहिए अन्यथा कथा सुनने का कोई अर्थ नहीं रह जाता।
गुरु जी ने कहा कि जो भी श्रीमद्भागवत पुस्तक के इस एक श्लोक का सही सही उच्चारण करेगा वही व्यास गद्दी पर आगे की कथा का पाठ करेगा। शाम का समय था काशीराम के घर पर ग्रामीणों की भीड़ जुट गई सभी यह देखना चाहते थे कि कथा पाठ करने के लिए होने वाले शास्त्रार्थ में कौन जीतेगा।
गुरु जी ने पंडित जी के बेटे को श्लोक पढ़ने को कहा,
यः स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेकमध्यात्मदीपमतितितीर्षतां तमोऽन्धम्।
संसारिणां करुणयाऽऽह पुराणगुह्यं तं व्याससूनुमुपयामि गुरुं मुनीनाम् ॥
माइक पर बोलते हुए बेटे ने श्लोक पढ़ा,
यः स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेकमध्यात्मदीपमतितितीर्षतां तमोऽन्धम्।
संसारिणा करुणयाऽऽह पुराणगुह्यं तं व्याससूनुमुपयामि गुरु मुनीनाम् ॥
गुरु जी मुस्कुराए, बोले बेटा आपने कोशिश अच्छी की लेकिन मुझे लगता है आपको एक बार फिर से ध्यान से पढ़ना चाहिए। बेटे ने कहा ध्यान से पढ़ रहा हूँ, और अब आगे की कथा मैं ही सुनाऊँगा। गुरु जी ने फिर से कहा एक बार पुनः पढ़े कहीँ कुछ गलत तो नहीं हो रहा। बेटे ने दुबारा बड़े ही जोश में फिर से पढ़ा।
यः स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेकमध्यात्मदीपमतितितीर्षतां तमोऽन्धम्।
संसारिणा करुणयाऽऽह पुराणगुह्यं तं व्याससूनुमुपयामि गुरु मुनीनाम् ॥
गुरु जी ने सोचा यदि मैं इन्हें बोलुँगा कि वे गलत उच्चारण कर रहे हैं तो शायद वह इस बात को मानने को तैयार ना हों, अतः गुरु जी ने गाँव के ही एक पढ़े लिखे व्यक्ति को पास बुलाया और कहा कि बेटा अभी जो आपने पढ़ा है एक बार इनके सामने पढ़कर सुना दीजिए। इस बार पंडित जी के बेटे ने क्रोध में आकर बड़ी तेज़ी से फिर वही गलत उच्चारण किया।
यः स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेकमध्यात्मदीपमतितितीर्षतां तमोऽन्धम्।
संसारिणा करुणयाऽऽह पुराणगुह्यं तं व्याससूनुमुपयामि गुरु मुनीनाम् ॥
गुरु जी कुछ बोलते कि उससे पहले गाँव के उस पढ़े लिखे व्यक्ति ने कहा गुरु जी कथा तो आप ही कहेँगे, अभी इनको और अधिक पढ़ने की आवश्यकता है। दरअलस पंडित जी के बेटे संसारिणां और गुरुं शब्द का गलत उच्चारण कर संसारिणा और गुरु बोल रहे थे।
अब पंडित जी को भी अपनी गलती का आभास हो गया था। वे बिना कुछ बोले वहाँ से चले गए।
गुरु जी ने पंडित जी के बेटे को से सम्मान अपने साथ बैठा कर आगे की कथा को ध्यान से सुनने को कहा
निर्णय हो चुका था, आगे की कथा पूरे 8 दिनों तक सभी ने बड़े ही आनंद पूर्वक सुनी अंतिम दिवस में हवन के बाद सभी ने भंडारे का प्रसाद ग्रहण किया। सब सन्तुष्ट थे।
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