यह कहानी उस समय की है जब पूज्य बाबा पारस नाथ मणि त्रिपाठी ने अपने बड़े पुत्र राम चन्द्र त्रिपाठी का विवाह सिद्धार्थ नगर के शोहरतगढ़ तहसील के गाँव परसोहियाँ में बड़े धूम धाम से कर अपने खानदान में अपनी बड़ी बहु लाए थे! आते ही बहू देविका ने घर का सारा काम धाम सम्हाल लिया था, बहू की समझदारी और घर के काम काज को देख कर सभी उससे बहुत प्रशन्न रहते थे! समय बीतता गया और घर में सबसे बड़े नाती ने जन्म लिया बाबा पारस नाथ ने उसका नाम सुरसरि मणि रखा!
एक बार की बात है सुरसरि करीब एक साल के रहे होंगे, अपनी माँ देविका के साथ सो रहे रहे थे! रात्रि के करीब 01 बजने को था, बगल के डेवढी (बरामदा) में सुरसरि की दादी भी गहरी नीद में थीं! अँधेरी रात थी, आसमान में तारे भी साफ़ नजर नहीं आ रहे थे! झींगुर ची ची की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी! बगल के घारी (पशुओं के बाधाने का स्थान) में भैस और उसका पड़वा (बच्चा) बधा था! तभी कुत्तों के भौकने से बहू देविका की नीद टूटी! वो अभी आँखे खोलती कि छप्पर के ऊपर से चढ़कर आँगन में किसी के कूदने की आवाज़ आयी! धपाक!
देविका अपने बिस्तर पर लेटी सब भांप रही थी! उन्हें एहसास हो गया था कि कोई चोर हमारे घर में चोरी करने घुस आया है! इतने में चोर आगे बढ़ डेहरी (अनाज रखने का मिट्टी का बना एक बड़ा पात्र) के आने (मुंह) को खोल अनाज किसी बोर में भरने लगा, शायद वह अनाज ही चुराने आया था! अनाज़ निकालता देख बहू को एक तरकीब सूझी उसने अनजान बनते हुए अपनी सासू माँ को आवाज लगाई!
"अम्मा ये अम्मा, लागत है पड़उआ छुटाय गय है, गोहूँवां खात है! "
बहू की आवाज़ सुन कर चोर थोडा रुक गया, उधर अम्मा भी जाग गई थी, अम्मा बोलीं
"बच्चा ढेबरिया जलाओ तो देखी, पता नाइ कौन मेर बाधें रहें!" (ढेबरी: उजाला करने के लिए)
सासू माँ को जगता देख बहू ने हिम्मत जुटाई, बगल में रखा माचिस उठा कर ताखे (दिवार में बना छोटा आलमारी) पर रखे ढेबरी को जलाने के लिए माचिस की तीली जलाई!
छररर... माचिस की तीली जल कर बुझ गई,
लेकिन उसके उजाले में एक धुधला सा चेहरा डेहरी बगल में हाथ में कुछ उठाए खड़ा दिखा! बहू सहम गई, हिम्मत जुटाते हुए दूसरी तीली जलाई,
इस बार सामने खड़ा चोर साफ़ दिख रहा था मुहँ पर लाल रंग का गमछा बांधे, हाथ में सिल (मसाला पीसने वाला पत्थर) ताने खड़ा था! बहू कुछ समझ पाती तब तक उसके पैर पर कुछ गिरा धड़ाम! चोर ने बहू के ऊपर सिल फ़ेक दिया था!
बहू दर्द से कराह उठी, उसने चिल्लाया चोर चोर...
अम्मा चोर, पकड़ो पकड़ो, घर के सभी लोग जाग गए थे, सब बहू की तरफ दौड़े
कहाँ चोर? क्या हुआ कहाँ गया? चोर घबरा कर भागा, बगल के दिवार को फांद कर बेह्रे (घर के पीछे का स्थान) की तरफ भाग गया!
बाबा अपनी लाठी लेकर पीछे की तरफ गए लेकिन चोर भाग निकला!
साहसी बहू अब शांत थी उसके पैर के नाख़ून पर गहरी चोट थी लेकिन वह खुश थी कि उसकी सूझ बुझ से घर में चोरी होने से बच गई! सबने उसके इस समझ और बहदुरी भरे कार्य की खूब प्रशंसा की!
एक बार की बात है सुरसरि करीब एक साल के रहे होंगे, अपनी माँ देविका के साथ सो रहे रहे थे! रात्रि के करीब 01 बजने को था, बगल के डेवढी (बरामदा) में सुरसरि की दादी भी गहरी नीद में थीं! अँधेरी रात थी, आसमान में तारे भी साफ़ नजर नहीं आ रहे थे! झींगुर ची ची की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी! बगल के घारी (पशुओं के बाधाने का स्थान) में भैस और उसका पड़वा (बच्चा) बधा था! तभी कुत्तों के भौकने से बहू देविका की नीद टूटी! वो अभी आँखे खोलती कि छप्पर के ऊपर से चढ़कर आँगन में किसी के कूदने की आवाज़ आयी! धपाक!
देविका अपने बिस्तर पर लेटी सब भांप रही थी! उन्हें एहसास हो गया था कि कोई चोर हमारे घर में चोरी करने घुस आया है! इतने में चोर आगे बढ़ डेहरी (अनाज रखने का मिट्टी का बना एक बड़ा पात्र) के आने (मुंह) को खोल अनाज किसी बोर में भरने लगा, शायद वह अनाज ही चुराने आया था! अनाज़ निकालता देख बहू को एक तरकीब सूझी उसने अनजान बनते हुए अपनी सासू माँ को आवाज लगाई!
"अम्मा ये अम्मा, लागत है पड़उआ छुटाय गय है, गोहूँवां खात है! "
बहू की आवाज़ सुन कर चोर थोडा रुक गया, उधर अम्मा भी जाग गई थी, अम्मा बोलीं
"बच्चा ढेबरिया जलाओ तो देखी, पता नाइ कौन मेर बाधें रहें!" (ढेबरी: उजाला करने के लिए)
सासू माँ को जगता देख बहू ने हिम्मत जुटाई, बगल में रखा माचिस उठा कर ताखे (दिवार में बना छोटा आलमारी) पर रखे ढेबरी को जलाने के लिए माचिस की तीली जलाई!
छररर... माचिस की तीली जल कर बुझ गई,
लेकिन उसके उजाले में एक धुधला सा चेहरा डेहरी बगल में हाथ में कुछ उठाए खड़ा दिखा! बहू सहम गई, हिम्मत जुटाते हुए दूसरी तीली जलाई,
इस बार सामने खड़ा चोर साफ़ दिख रहा था मुहँ पर लाल रंग का गमछा बांधे, हाथ में सिल (मसाला पीसने वाला पत्थर) ताने खड़ा था! बहू कुछ समझ पाती तब तक उसके पैर पर कुछ गिरा धड़ाम! चोर ने बहू के ऊपर सिल फ़ेक दिया था!
बहू दर्द से कराह उठी, उसने चिल्लाया चोर चोर...
अम्मा चोर, पकड़ो पकड़ो, घर के सभी लोग जाग गए थे, सब बहू की तरफ दौड़े
कहाँ चोर? क्या हुआ कहाँ गया? चोर घबरा कर भागा, बगल के दिवार को फांद कर बेह्रे (घर के पीछे का स्थान) की तरफ भाग गया!
बाबा अपनी लाठी लेकर पीछे की तरफ गए लेकिन चोर भाग निकला!
साहसी बहू अब शांत थी उसके पैर के नाख़ून पर गहरी चोट थी लेकिन वह खुश थी कि उसकी सूझ बुझ से घर में चोरी होने से बच गई! सबने उसके इस समझ और बहदुरी भरे कार्य की खूब प्रशंसा की!

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