अप्रेल माह का शुरुआती दिन था गेहूँ की फसल पक कर तैयार अपने कटने का इंतज़ार कर रही थी। दिन में ज्यादा धूप होने के नाते गेहूं की कटाई रात में हुआ करते थे शाम के समय लोग अपने खेतों में जाते और चांद की रोशनी में गेहूं काटते थे। रात के करीब 10:00 बजने को थे अधिकतर लोग अपने खेतों में जाने के लिए तैयार बाले चाचा के घर के सामने कुछ गपशप कर रहे थे, तभी गांव के पूरब पोखरे की तरफ से शौच से लौट रहे लालमन ने घबराते हुए आवाज में बताया कि पोखरे के उस तरफ कुछ लोग भारी संख्या में टॉर्च जला रहे हैं, लगता है वहां पर डाकुओं का झुंड है जो आज रात में हमारे गांव पर हमला कर सकता है। गया बाबा ने लालमन को डांटते हुए कहा "धत्त तेरी की यहां कहां डाकू आ जाएंगे, अरे कोई और होगा जो अपने खेत में कटाई कर रहा होगा।" अरे नहीं नहीं बाबा मैंने तो एक को पेड़ पर चढ़ा हुआ भी देखा वह पेड़ पर टार्च जलाकर गांव की तरफ देख रहा था लालमन ने फिर से अपनी बात रखी। अब सभी को लालमन की बातों पर बातों पर विश्वास होने लगा था। सबने सोचा क्यों ना एक साथ चल कर पोखरे के उस तरफ देखा जाए, अगर सच में वहां कोई डाकुओं का झुंड है तो हम लोग उसे गांव में आने से पहले ही खदेड़ दें।
देखते ही देखते या खबर पूरे गांव में आग की तरह फैल गई सभी लोग अपने अपने घरों घरों से लाठी-डंडे लेकर पोखरे की तरफ निकल पड़े। गांव के जाने-माने पहलवान और लठैत बाबा कृष्णकांत भी अपना तेल लगा हुआ मोटा वाला लाठी लेकर पोखरे पर चलने को तैयार थे। सबके हाथ में लाठी-डंडे, टॉर्च, लालटेन आदि दिख रहे थे। गांव की महिलाएं अपने-अपने घरों से निकलकर किसी के बड़े घर में इकट्ठा होकर दरवाजा बंद कर छुप गई थी, की अगर डाकू ने हमला किया तो हम सब एक साथ उन पर टूट पड़ेंगे। सबने पोखरे की तरफ आगे बढ़ते हुए तेज स्वर में आवाज लगाई "रुके रहो - रुके रहो आ गए गए रुके रहो आ गए गए हम। भागना नहीं एक एक को वही मारेंगे, एक भी डाकू आज हमारे हाथों से बचने नहीं पाएगा।"
उधर यूपी बोर्ड की परिक्षाएं चल रही थी। ड्यूटी पर लगे पांडे दरोगा जी अपने अन्य साथी पुलिस कर्मियों के साथ रात्रि में विश्राम के लिए विद्यालय के आस पास ही कहीँ रहा करते थे। इतने सारे लोगों का एक साथ शोर सुनकर शोर सुनकर सुनकर पांडे दरोगा जी अपनी पूरी टीम के साथ गांव की तरफ निकल पड़े। दरोगा जी अपनी बड़ी वाली टार्च जलाते हुए दहाड़े "रुको रुको हम भी आ गए कोई भागेगा नहीं वहीं ठहर जाओ किसी को नहीं छोड़ेंगे"
दूसरी तरफ से पांडे दरोगा जी की दहाड़ सुनकर गांव के लोग घबरा गए उन्हें लगा कि उधर से डाकुओं ने भी हमला कर दिया है। घर में बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा के लिए सब लोग अपने घर की तरफ भागने लगे। भागो भागो डाकुओं ने गांव पर हमला गांव पर हमला कर दिया है, अपने-अपने घरों में छिप जाओ घर जाओ, घर के दरवाजे बंद करो ऐसा शोर मचाते मचाते हुए गांव का एक व्यक्ति दौड़ा।
पूरे गांव में भगदड़ मच गई सब लोग अपने अपने घर का दरवाजा बंद किए डाकुओं का इंतजार करने लगे। बाबा कृष्णकांत अपने भतीजे जमुना के साथ लाठी लिए दरवाजे के किनारे खड़े थे। एक तरफ लठैत बाबा दूसरी तरफ उनका भतीजा जमुना लाठी ताने बिल्कुल बिल्कुल तैयार खड़े थे। तभी सड़क के किनारे एक महिला अपना घड़ा लिए भाग रही थी। उधर दरोगा पांडे जी मोटरसाइकिल लिए महिला के पास आ धमके उन्हें देखते हैं महिला अपना घड़ा लिए उनके मोटरसाइकिल के सामने गिर पड़ी। "मुझे छोड़ दो मुझे छोड़ दो मुझे मत मारना कहती हुई रोने लगी" पांडे जी बोले "अरे अरे घबराओ नहीं क्या हुआ कौन तुम्हें मार रहा है मैं हूँ, पांडे दरोगा डरो नहीं कहां गया डाकू मुझे बताओ कोई नहीं बच पाएगा किधर है" पांडे जी ने अपनी तेज आवाज में बोला। पांडे जी की आवाज सुनकर लठैत बाबा और आसपास के लोग अपने-अपने घरों से बाहर निकलने लगे। कोई मंडीले (पशुओं के भूसा रखने का स्थान) से निकल रहा था, तो कोई कंडउरे (चूल्हा जलाने वाले उपले का स्थान) के नीचे से बाहर आ रहा था। पांडे जी ने लठैत बाबा से पूछा "तिवारी जी कहां है डाकू किधर गए?"
शायद इतने सारे लोगों को अपनी तरफ आता देख भाग गए या फिर उधर गेहूं के खेत की तरफ छुप गए होंगे, लठैत बाबा ने जवाब दिया। धीरे धीरे सभी लोग अपने घरों से बाहर आने लगे सारा माहौल शांत हो रहा था, पुलिस की टीम को गांव में देखकर सब ने चैन की सांस ली।
हम लोग यही पास वाले स्कूल में में रुके हुए हैं हमारी ड्यूटी यही है आप लोग घबराए नहीं कोई डाकू गांव पर हमला नहीं कर सकता पांडे जी ने सब को सांत्वना दे कर विश्राम करने चले गए।
इधर लठैत बाबा अपने घर में भोजन करते हुए उसी बात की चर्चा कर रहे थे मैं और जमुना दोनों लाठी लेकर खड़े थे अगर कोई घर में घुसता तो एक लाठी इधर से और एक लाठी उधर से पड़ता डाकू का बच्चा तुरंत छटपटा कर गिर जाता कहता "अरे बाप मर गए अरे दादा मर गए"।
तभी प्रधान बाबा बोले ऐसे थोड़ी ना कहता, अपने हाथ में उठाया हुआ कौर थाली में रखते हुए बोले लाठी पड़ते ही डाकू कहता "मार दिया साला"
देखते ही देखते या खबर पूरे गांव में आग की तरह फैल गई सभी लोग अपने अपने घरों घरों से लाठी-डंडे लेकर पोखरे की तरफ निकल पड़े। गांव के जाने-माने पहलवान और लठैत बाबा कृष्णकांत भी अपना तेल लगा हुआ मोटा वाला लाठी लेकर पोखरे पर चलने को तैयार थे। सबके हाथ में लाठी-डंडे, टॉर्च, लालटेन आदि दिख रहे थे। गांव की महिलाएं अपने-अपने घरों से निकलकर किसी के बड़े घर में इकट्ठा होकर दरवाजा बंद कर छुप गई थी, की अगर डाकू ने हमला किया तो हम सब एक साथ उन पर टूट पड़ेंगे। सबने पोखरे की तरफ आगे बढ़ते हुए तेज स्वर में आवाज लगाई "रुके रहो - रुके रहो आ गए गए रुके रहो आ गए गए हम। भागना नहीं एक एक को वही मारेंगे, एक भी डाकू आज हमारे हाथों से बचने नहीं पाएगा।"
उधर यूपी बोर्ड की परिक्षाएं चल रही थी। ड्यूटी पर लगे पांडे दरोगा जी अपने अन्य साथी पुलिस कर्मियों के साथ रात्रि में विश्राम के लिए विद्यालय के आस पास ही कहीँ रहा करते थे। इतने सारे लोगों का एक साथ शोर सुनकर शोर सुनकर सुनकर पांडे दरोगा जी अपनी पूरी टीम के साथ गांव की तरफ निकल पड़े। दरोगा जी अपनी बड़ी वाली टार्च जलाते हुए दहाड़े "रुको रुको हम भी आ गए कोई भागेगा नहीं वहीं ठहर जाओ किसी को नहीं छोड़ेंगे"
दूसरी तरफ से पांडे दरोगा जी की दहाड़ सुनकर गांव के लोग घबरा गए उन्हें लगा कि उधर से डाकुओं ने भी हमला कर दिया है। घर में बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा के लिए सब लोग अपने घर की तरफ भागने लगे। भागो भागो डाकुओं ने गांव पर हमला गांव पर हमला कर दिया है, अपने-अपने घरों में छिप जाओ घर जाओ, घर के दरवाजे बंद करो ऐसा शोर मचाते मचाते हुए गांव का एक व्यक्ति दौड़ा।
पूरे गांव में भगदड़ मच गई सब लोग अपने अपने घर का दरवाजा बंद किए डाकुओं का इंतजार करने लगे। बाबा कृष्णकांत अपने भतीजे जमुना के साथ लाठी लिए दरवाजे के किनारे खड़े थे। एक तरफ लठैत बाबा दूसरी तरफ उनका भतीजा जमुना लाठी ताने बिल्कुल बिल्कुल तैयार खड़े थे। तभी सड़क के किनारे एक महिला अपना घड़ा लिए भाग रही थी। उधर दरोगा पांडे जी मोटरसाइकिल लिए महिला के पास आ धमके उन्हें देखते हैं महिला अपना घड़ा लिए उनके मोटरसाइकिल के सामने गिर पड़ी। "मुझे छोड़ दो मुझे छोड़ दो मुझे मत मारना कहती हुई रोने लगी" पांडे जी बोले "अरे अरे घबराओ नहीं क्या हुआ कौन तुम्हें मार रहा है मैं हूँ, पांडे दरोगा डरो नहीं कहां गया डाकू मुझे बताओ कोई नहीं बच पाएगा किधर है" पांडे जी ने अपनी तेज आवाज में बोला। पांडे जी की आवाज सुनकर लठैत बाबा और आसपास के लोग अपने-अपने घरों से बाहर निकलने लगे। कोई मंडीले (पशुओं के भूसा रखने का स्थान) से निकल रहा था, तो कोई कंडउरे (चूल्हा जलाने वाले उपले का स्थान) के नीचे से बाहर आ रहा था। पांडे जी ने लठैत बाबा से पूछा "तिवारी जी कहां है डाकू किधर गए?"
शायद इतने सारे लोगों को अपनी तरफ आता देख भाग गए या फिर उधर गेहूं के खेत की तरफ छुप गए होंगे, लठैत बाबा ने जवाब दिया। धीरे धीरे सभी लोग अपने घरों से बाहर आने लगे सारा माहौल शांत हो रहा था, पुलिस की टीम को गांव में देखकर सब ने चैन की सांस ली।
हम लोग यही पास वाले स्कूल में में रुके हुए हैं हमारी ड्यूटी यही है आप लोग घबराए नहीं कोई डाकू गांव पर हमला नहीं कर सकता पांडे जी ने सब को सांत्वना दे कर विश्राम करने चले गए।
इधर लठैत बाबा अपने घर में भोजन करते हुए उसी बात की चर्चा कर रहे थे मैं और जमुना दोनों लाठी लेकर खड़े थे अगर कोई घर में घुसता तो एक लाठी इधर से और एक लाठी उधर से पड़ता डाकू का बच्चा तुरंत छटपटा कर गिर जाता कहता "अरे बाप मर गए अरे दादा मर गए"।
तभी प्रधान बाबा बोले ऐसे थोड़ी ना कहता, अपने हाथ में उठाया हुआ कौर थाली में रखते हुए बोले लाठी पड़ते ही डाकू कहता "मार दिया साला"

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